एक गाँव जहाँ लगता है भूतों का मेला

एक गाँव जहाँ लगता है भूतों का मेला

एक गाँव जहाँ लगता है भूतों का मेला

Dec 01st, 2020


मलाजपुर गांव जहाँ लगता है भूतों का मेला 
Real horror stories
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दोस्तों-

आप में से बहुत से लोग होंगे जो भूत प्रेत की बातों पर विश्वास नहीं करते होंगे। मगर क्या आप जानते हैं कि मध्यप्रदेश के बैतूल जिले से forty two किमी दूर चिचोली तहसील मुख्यालय से करीब 7 कि.मी दूरी पर बसे मलाजपुर गांव में आज के समय में भी भूतों का मेला लगता है। जी हां, हैरान करने देने वाला ये तथ्य बिल्कुल सच है। लोक मान्यताओं के आधार पर यहां हर साल मकर संक्रांति की पूर्णिमा को भूतों का मेला लगता है यो वसंत पंचमी तक चलता है। यहां आस-पास के निवासियों द्वारा जानकारी दी गई है कि यहां दूर-दूर से लोग अपने परिजनों को प्रेत-आत्माओ से मुक्ति दिलवाने के लिए आते हैं। तो चलिए दोस्तों जानते है मलाजपुर गांव और वहाँ लगती रहस्यमयी मेले के बारे में---


बाबा साहेब की समाधि

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पौराणिक कथाओं के अनुसार 1770 में गुरु साहब बाबा नाम के संत यहां पर अपनी शक्तियों के द्वारा लोगों की समस्याओं का समाधान करते थे और लोगों को प्रेत-तो दिआलवाते थे। गांव के सभी लोग उन्हें भगवान का ही रूप मानते थे। बाबा के पास ऐसी चमत्कारिक शक्तियां थीं की वह प्रेत-आत्माओं को वश में कर लिया करते थे। उन्होंने एक वृक्ष के नीचे ही जिंदा समाधि ले ली थी। बाद में गांववालों ने समाधी स्थल के पास में ही एक मंदिर बनवाया और हर वर्ष उनकी याद में मेले का आयोजन प्रारंभ करवा दिया। गांव वाले भूतों के इस मेले में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। बाबा के समाधी लेने के बाद भी यहां प्रेत-आत्माओं से पीड़ित व्यक्ति को प्रेतबाधा से मुक्ति मिल जाती है।

दरअसल बैतुल में बंधारा नदी किनारे पर मलाजपुर के बाबा के समाधि स्थल है जिसके आसपास के पेड़ों की झुकी डालियां उलटे लटके भूत-प्रेत की याद दिलवा देती हैं। माना जाता है कि जिस व्यक्ति के शरीर में प्रेत-आत्मा होती है उसके शरीर के अंदर से प्रेत बाबा की समाधि के एक दो चक्कर लगाने के बाद अपने आप उसके शरीर से निकल कर पास के किसी भी पेड़ पर उलटा लटक जाती है। भूत-प्रेत बाधा निवारण के लिए गुरु साहब बाबा के मंदिर पूरे भारत में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। बाबा की समाधि के पूरे चक्कर लगाने के पहले ही बाबा के हाथ-पैर जोड़ कर मिन्नत मांगने वाला व्यक्ति का सर पटक कर कर माफी मांगने के लिए पेट के बल पर लोटने का सिलसिला तब तक चलता है जब तब कि उसके शरीर से वह तथाकथित भूत यानी कि अदृश्य आत्मा निकल नहीं जाती।


समाधि पर जाते ही बोलने लगते हैं भूत-प्रेत


जिस किसी व्यक्ति को भूत-प्रेत लगे होते हैं उसे सबसे पहले बंधारा नदी में स्नान करवाया जाता है। उसके बाद पीड़ित व्यक्ति को गुरु साहब बाबा की समाधि पर लाया जाता है। जहां गुरु साहब बाबा के चरणों पर नमन करते ही पीड़ित व्यक्ति झूमने लगता है और उसके शरीर में एक अलग ही शक्ति आने लगती है जिससे उसकी सांसे तेज हो जाती है और आंखे लाल होकर एक जगह स्थिर हो जाती हैं। इतना होने के पश्चात जैसे ही बाबा की पूजा प्रक्रिया प्रारंभ होती है वैसे ही प्रेत-बाधा पीड़ित व्यक्ति के मुंह से अपने आप में परिचय देती है, पीड़ित व्यक्ति को छोड़ देने की प्रतिज्ञा करती है। इस अवस्था में पीड़ित आत्मा विभूषित हो जाती है और बाबा के श्री चरणों में दंडवत प्रणाम कर क्षमा याचना मांगता है। एक बात तो यहां पर दावे के साथ कही जा सकती है कि, प्रेत-आत्मा से पीड़ित व्यक्ति यहां आता है तो वह निश्चित ही यहां से प्रेत बाधा से मुक्त होकर ही जाते है।

 


मकर सक्रांति के बाद पूर्णिमा पर भी लगता है मेला


प्रतिवर्ष मकर संक्राति के बाद वाली पूर्णिमा को लगने वाले इस भूतों के मेले में आने वाले सैलानियों में देश-विदेश के लोगों की संख्या काफी होती है। यह मेला एक माह तक चलता है। ग्राम पंचायत मलाजपुर इसका आयोजन करती है। कई अंग्रेजों ने पुस्तकों एवं उपन्यासों तथा स्मरणों में इस मेले का जिक्र किया है। इन विदेशी लेखकों के किस्सों के चलते ही हर वर्ष कोई ना कोई विदेशी बैतूल जिले में स्थित मलाजपुर के गुरू साहेब के मेले में आता है तथा स्मरणों में इस मेले का जिक्र किया है। इन विदेशी लेखकों के किस्सों के चलते ही हर वर्ष कोई ना कोई विदेशी बैतूल जिले में स्थित मलाजपुर के गुरू साहेब के मेले में आता है।

प्रेत-आत्माओं की समस्या से मुक्ति

बताया जाता है मंदिर में लगने वाले भूतों के मेले में बुरी आत्माओं, भूत-प्रेतों और चुड़ैल से प्रभावित लोग पेड़ की परिक्रमा करते हैं और अपनी बाधाएं दूर करते हैं। शाम की पूजा के बाद पेड़ की परिक्रमा की जाती है।मान्यता के अनुसार प्रेत-आत्माओं से परेशान व्यक्ति विपरीत दिशा में परिक्रमा करता है, जबकि दूसरे सीधी दिशा में ही परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा के दौरान जिन पर भूत-प्रेत का साया होता है वह कपूर जलाकर अपने हाथ और जुबान पर रख लेते हैं। मान्यताओं के अनुसार सभी भूतप्रेत बाबा से भीख मांगते हैं और वादा करते हैं कि अब इस व्यक्ति के शरीर में कभी प्रवेश नहीं करूंगा या करूंगी।

गुड़ दान देने की परंपरा

प्रेत-आत्माओं से मुक्ति मिल जाने के बाद यहां पर व्यक्ति के वजन जितना गुड़ मंदिर में दान दिया जाता है। यहां काफी मात्रा में गुड़ जमा होने के बाद भी उसमें कीड़े, मक्खियां या चीटियां नहीं लगती हैं। यह भी एक चमत्कार से काम नहीं।

तो दोस्तों कैसी लगी यह real life stories
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Posted by : Sagar Maharana

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